Gitapress Gorakhpur
Gajendra Moksha - गजेन्द्र मोक्ष Gitapress Gorakhpur Book Code 225
Gajendra Moksha - गजेन्द्र मोक्ष Gitapress Gorakhpur Book Code 225
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Book Name - Gajendra Moksha Gitapress Gorakhpur Book Code 225
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गजेन्द्र मोक्ष (Gajendra Moksha) श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध (अध्याय 2 से 4) में वर्णित एक अत्यंत प्रसिद्ध, भक्तिमय और भावुक कथा है। यह कथा केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं है, बल्कि यह जीव का अहंकार, उसका कष्ट और ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति (Surrender) का प्रतीक है।
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कथा का संक्षेप (The Story)
1. गजेन्द्र का बल और अहंकार
त्रिकूट पर्वत पर 'ऋतुमान' नामक एक सुंदर सरोवर था। वहाँ गजेन्द्र (हाथियों का राजा) अपने विशाल बल, हाथियों के यूथ (झुंड) और परिवार के साथ निवास करता था। एक दिन गजेन्द्र अत्यधिक गर्मी से व्याकुल होकर जलक्रीड़ा करने के लिए अपने परिवार सहित सरोवर में उतरा। उसे अपने अपार शारीरिक बल पर पूर्ण गर्व था।
2. ग्राह (मगरमच्छ) का आक्रमण और लंबा युद्ध
जल में निवास करने वाले एक अत्यंत बलशाली ग्राह (मगरमच्छ) ने गजेन्द्र का पैर अपने जबड़ों में जकड़ लिया। गजेन्द्र ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर खुद को छुड़ाने का प्रयास किया। तट पर खड़े उसके साथी हाथियों और परिवार ने भी उसे खींचने की कोशिश की, लेकिन जल में ग्राह का बल अधिक था।
यह भयानक युद्ध एक या दो दिन नहीं, बल्कि एक हजार वर्षों (1,000 Years) तक चलता रहा।
3. शक्ति का क्षय और अशरण अवस्था
धीरे-धीरे गजेन्द्र का शारीरिक बल, साथियों का साथ और अहंकार सब समाप्त हो गए। उसके परिवार के हाथी उसे असहाय छोड़कर चले गए। जब गजेन्द्र पूरी तरह से थक गया और उसे अहसास हुआ कि कोई भी सांसारिक बल या संबंधी उसे मृत्यु से नहीं बचा सकता, तब उसका अहंकार पूरी तरह टूट गया।
4. गजेन्द्र की स्तुति और पूर्ण शरणागति
गजेन्द्र ने जल में से एक कमल का पुष्प अपनी सूंड में उठाया और उसे आकाश की ओर उठाकर अश्रुपूर्ण नेत्रों से संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी परमेश्वर का ध्यान किया। उसने भगवान की अत्यंत गूढ़ एवं दार्शनिक स्तुति की (जिसे भागवत में 'गजेन्द्र स्तुति' कहा गया है)। उसने प्रार्थना की:
> "हे प्रभु! न मैं स्वयं को बचा सकता हूँ, न ही कोई अन्य। अब आप ही मेरे एकमात्र रक्षक हैं, मैं आपकी शरण में हूँ।"
5. भगवान विष्णु का आगमन और मोक्ष
गजेन्द्र की करुण पुकार सुनते ही, जगतपति भगवान श्री हरि विष्णु गरुड़ पर सवार होकर तत्काल प्रकट हुए। उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से ग्राह का मस्तक काटकर गजेन्द्र को उसके चंगुल से मुक्त किया और उसे मोक्ष प्रदान किया।
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पूर्वजन्म का रहस्य (Karmic Background)
गजेन्द्र: अपने पूर्वजन्म में द्रविड़ देश का राजा इन्द्रद्युम्न था। वह अगस्त्य ऋषि का आदर न करने के कारण हाथी बनने के श्राप को प्राप्त हुआ था।
ग्राह: अपने पूर्वजन्म में हूहू नामक गंधर्व था, जो देवल ऋषि के श्राप के कारण मगरमच्छ बना था। भगवान के चक्र से मृत्यु पाकर वह भी शापमुक्त होकर दिव्य रूप को प्राप्त हुआ।
गजेन्द्र मोक्ष का आध्यात्मिक संदेश (Key Takeaway)
1. अहंकार का पतन: जब तक व्यक्ति को अपने धन, बल, बुद्धि या संबंधों का अहंकार रहता है, तब तक उसे ईश्वर की सच्ची अनुभूति नहीं होती।
2. संसार 'ग्राह' है, जीव 'गजेन्द्र' है: यहाँ मगरमच्छ काल/संसार (माया) का प्रतीक है जो जीव को जकड़े हुए है।
3. शरणागति की शक्ति: जब मनुष्य अपनी संपूर्ण सामर्थ्य हारकर ईश्वर के चरणों में अहेतुकी शरणागति (अनन्य भक्ति) अर्पण करता है, तो ईश्वर पल भर में उसके सारे दुःखों का नाश कर देते हैं।
> मान्यता: शास्त्रों के अनुसार, प्रतिदिन 'गजेन्द्र मोक्ष' या 'गजेन्द्र स्तुति' का पाठ करने से व्यक्ति को घोर संकटों, कर्जों, दुर्घटनाओं और भय से मुक्ति मिलती है।
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