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Gitapress Gorakhpur

Vedic Sukta-Sangrah ( वैदिक सूक्त संग्रह ) By Gita Press Gorkhpur CODE-1885

Vedic Sukta-Sangrah ( वैदिक सूक्त संग्रह ) By Gita Press Gorkhpur CODE-1885

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Vedic Sukta-Sangrah ( वैदिक सूक्त संग्रह  ) By Gita Press Gorkhpur CODE-1885

MRP - 50

Handling Charge - 50

Language - Hindi

Page - 255

Publisher - Gitapress Gorakhpur ( गीताप्रेस गोरखपुर )

Vaidik Sukta Sangraha (Sanuvad) (Gita Press, Gorakhpur) / Vaidik Sukt-Sangrah / Vaidik Sukta-Sangraha / Vedik Sukta Sangraha (Code 1885)(Geeta Press)

निवेदन 

यस्य निःश्वसितं वेदा यो वेदेभ्योऽखिलं जगत् ।
निर्ममे तमहं वन्दे विद्यातीर्थं महेश्वरम् ॥ - ( श्रीसायणाचार्य )

वेदको ईश्वरका निःश्वास कहा गया है, वेदसे ही समस्त जगत् का निर्माण हुआ है। इसीलिये भारतीय संस्कृतिमें वेदकी अनुपम महिमा है। जिस प्रकार ईश्वर अनादि - अपौरुषेय है, उसी प्रकार वेद भी अनादि अपौरुषेय है। वेदको देव, पितर एवं मनुष्योंका सनातन चक्षु कहा गया है— 'देवपितृमनुष्याणां वेदश्चक्षुः सनातनः'। मनु महाराजके अनुसार तीनों कालोंमें इनका उपयोग है और सब वेदसे प्राप्त होता है—'भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात् प्रसिध्यति'। भारतीय मान्यताके अनुसार वेद ब्रह्मविद्याके ग्रन्थभाग नहीं, स्वयं ब्रह्म हैं - शब्दब्रह्म हैं । वेद अनन्त हैं- 'अनन्ता वै वेदाः '। तैत्तिरीय आरण्यककी एक आख्यायिकाके अनुसार इन्द्रद्वारा बार-बार आयु पाकर भी भरद्वाजमुनि वेदका अन्त न पा सके तथा वे इसी निष्कर्षपर पहुँचे कि वेदका अन्त नहीं है। उसी अनन्त वेदराशिके कुछ अंशको लेकर भगवान् वेदव्यासजीने चार विभाग किये; जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेदके नामसे लोकमें प्रकट हैं।

   प्रत्येक वेदकी अनेक शाखाएँ होनेके प्रमाण मिलते हैं। यथा-मिलाकर ऋग्वेदकी 21 शाखाएँ, यजुर्वेदकी 101 शाखाएँ, सामवेदी 1000 शाखाएँ तथा अथर्ववेदकी 9 शाखाएँ अर्थात् कुल 113 शाखाएँ थीं, परंतु इनमेंसे मात्र 12 शाखाएँ ही आज उपलब्ध होती हैं, शेष लुप्त होती गयीं। इसके अतिरिक्त ब्राह्मण, आरण्यक आदि विशाल वैदिक-वाङ्गमय भी उपलब्ध है, जिसके अध्ययनके बिना प्राप्त वेद-संहिताओंका आशय समझना प्रायः असम्भव है।
    आज मनुष्यकी अल्प आयु, व्याकरणकी ओर विमुखता तथा वर्तमान जीवनकी व्यस्तताओंके बीच उनका अध्ययन तथा मनन करना अत्यन्त दुष्कर होता जा रहा है, अतः वेदोंमें यत्र-तत्र जो सूक्तरूपी अनेक मुक्ता-मणियाँ बिखरी पड़ी हैं, उन्हीं में से कुछको एक सूत्रमें पिरोकर वेदप्रेमी पाठकोंके लाभार्थ प्रस्तुत किया गया
है, जिसमें व्यक्तिकी अभीष्ट सिद्धिके अमोघ उपादान अन्तर्निहित हैं। निष्ठा एवं आस्थाके द्वारा व्यक्ति अपनी विविध कामनाओंकी पूर्ति इनके माध्यमसे करनेमें समर्थ है तथा जीवनमें चतुर्दिक् सफलताके लिये आवश्यक ऊर्जा, उत्साह, प्रेरणा एवं मार्गदर्शन भी इनसे प्राप्त कर सकता है।

   'सूक्त' शब्द 'सु' उपसर्गपूर्वक 'वच्' धातुसे 'क्त' प्रत्यय करनेपर व्याकृत होता है। 'सूक्त' शब्दका अर्थ हुआ— 'अच्छी रीतिसे कहा हुआ'। वैदिक मन्त्रोंके पूर्व निश्चित विशिष्ट मन्त्रसमूह ही सूक्त कहे जाते हैं, जो वेदमन्त्रसमूह एकदैवत्य और एकार्थ-प्रतिपादक हो, उसे सूक्त कहा जाता है। 'बृहद्देवता' ग्रन्थमें 'सूक्त'
शब्दका निवर्चन इस प्रकार किया गया है— 'सम्पूर्णं ऋषिवाक्यं तु सूक्तमित्यभिधीयते' – अर्थात् सम्पूर्ण ऋषिवचनोंको सूक्त कहते हैं। 'बृहद्देवता' (१ । १६ ) - में चार प्रकारके सूक्तोंका वर्णन प्राप्त
होता है। जैसे - ( १ ) देवता-सूक्त, (२) ऋषि-सूक्त, (३) अर्थ- सूक्त और (४) छन्दः-सूक्त -
देवतार्षार्थछन्दस्तो वैविध्यं च प्रजायते। ०००१
ऋषिसूक्तं तु यावन्ति सूक्तान्येकस्य वै स्तुतिः ॥ १६९१

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